‘पुष्पा’ फिल्म की दो समीक्षाएं, क्या है आपकी राय

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इन दिनों फिल्म पुष्पा का काफी चर्चा है। इस फिल्म ने अच्छा कारोबार भी किया है और युवाओं के मन पर छाई हुई है। लेकिन पटकथा को लेकर कई समीक्षाएं विरोधाभासी हैं। ऐसी ही तमाम समीक्षाओं में दो समीक्षाएं यहां हम दे रहे हैं। पाठक व फिल्म देख चुके लोग बताएं कि वे इन समीक्षाओं से कितना संतुष्ट हैं और उनकी खुद की क्या राय है। (Reviews Of ‘Pushpa’ Movie)

Sandhya Navodita

वरिष्ठ कवियित्री संध्या नवोदिता कहती हैं। पुष्पा एकदम स्टाइलिश मसाला फ़िल्म है। जैसे अमिताभ बच्चन की पुरानी फिल्में होती थीं, जिन्होंने अमिताभ को स्टार बनाया। अंतर थोड़ा-सा यह है कि पुरानी फिल्मों में अमिताभ कहीं आकर्षक भी लगते थे, जबकि पुष्पा का हीरो हर सीन में पुष्पा ही लगता है, उतने ही चालू कपड़े, चाल और संवाद करता हुआ। वह धांसू डायलॉगबाजी करता है, अकेले सौ को पीट लेता है और रजनीकांत स्टायल अदा दिखाता हुआ चल देता है।

अल्लू अर्जुन ने अपना रोल ज़बरदस्त किया है, पुष्पा की चाल, उसका झुका और तना कंधा, उसकी नृत्य कला, संवाद अदायगी, मेकअप, वस्त्र विन्यास, केश विन्यास सब की तारीफ करनी पड़ेगी। पुष्पा के चरित्र को हर फ्रेम में जीवंत कर दिया है। फ़िल्म के अन्य चरित्र भी उतने ही कनविंसिंग हैं। सब की अदाकारी, चाल, चरित्र , संवाद फ़िल्म को मजबूत करते हैं।

अभिनेत्री रश्मिका मंदाना बॉलीवुड की तरह लिपी पुती नहीं बल्कि बहुत सहज और सरल अवतार में आई हैं और मोहक हैं। उनको देखना दिलचस्प लगता है।

हिन्दी फिल्में देखकर परिपक्व हुआ दर्शक ऐसी कई फिल्में अपने जीवन में देख चुका होगा पर रोमांच, दबंगई, नायकत्व की ज़रूरत तो हर दौर के युवाओं को होती है। जब तक सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था ऐसी है, जो दबंग और बलशाली होने को जस्टिफाई करती है तब तक ऐसे नायक प्रभावित भी करेंगे। अमिताभ बच्चन से अब तक भारतीय राजनीति का मूल चरित्र बदला नहीं है। वही अपराधीकरण, माफिया का प्रभाव, दबंगों का उभार आम जनता के प्रति क्रूरता सब यथावत है। तो नायक भी अपने प्रति हो रही सामंती हिंसा का जवाब अपनी दबंगई से दे रहा है।

लिहाजा टीनएजर और नवयुवा इस फ़िल्म का स्वागत वैसे ही कर रहे हैं जैसे अपने वक्त की नई पीढ़ी ने बॉबी, एक दूजे के लिए, मैंने प्यार किया जैसी रोमांटिक फिल्मों का किया था। (Reviews Of ‘Pushpa’ Movie)

हर टीनएजर पीढ़ी का अपना अमिताभ बच्चन होता है। कभी वह रजनीकांत होता है तो आज वह अल्लू अर्जुन हैं।

फ़िल्म के गाने के कुछ बोल तो बड़े असभ्य टाइप हैं, पर श्रीवल्ली वाला गाना सुपर हिट हो गया है और डांस भी। अल्लू के एक कान से हाथ सटा के दूसरे कान तक ले जाने की अदा की खूब कॉपी हो रही है।

हिंदी में श्रेयस तलपड़े ने अर्जुन की हिंदी डबिंग की है। यह बताना जरूरी है क्योंकि आवाज़ शानदार है और अल्लू के किरदार पर बहुत फिट हो रही है।

Dinesh Shrinet

वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म-साहित्य समीक्षक दिनेश श्रीनेत कहते हैं, ‘पुष्पा’ फिल्म की काफी तारीफ़ हो रही है, कुछ वेबसाइट्स पर और जगह-जगह फेसबुक पर भी। किंचित जागरुक और बौद्धिक माने जाने वाले लोगों की पोस्ट में तारीफ़ की कोई वजह स्पष्ट नहीं है। फ़िल्म मनोरंजक है, यह बात बार-बार अलग-अलग तरीके से कही गई है। मगर मनोरंजन कैसा? मेरी पुष्पा फ़िल्म से कई तरह की असमहतियां हैं। (Reviews Of ‘Pushpa’ Movie)

पहली असहमति, यह फिल्म लाल चंदन की तस्करी को ग्लोरीफाई करती है। निःसंदेह 300 करोड़ कमाने वाली इस फिल्म में जब पुष्पा पुलिस की आंख में धूल झोंककर लकड़ियों के लट्ठे नदी में बहाता है तो जरूर सिनेमाहाल में तालियां बजी होंगी। इस वक्त, जब पर्यावरण की चिंताएं किताबों से निकलकर हमारी आती-जाती सांस पर टिक गई हैं, जब पारिस्थितिकी एक राजनीतिक मुद्दा बन चुका है, ऐसी फिल्म को, ऐसी अवधारणा को कैसे नज़रंदाज़ किया जा सकता है?

दूसरी समस्या है कि फिल्म लोकप्रिय सिनेमा की धारा में स्त्री विमर्श के एक बेहतरीन उभार को अवरुद्ध करती है। ‘पुष्पा’ पितृसत्तात्मकता को पुनर्स्थापित करने वाली फ़िल्म है। पुष्पा का सारा कांप्लेक्स इस बात का है कि उसकी पहचान उसके पिता के नाम से नहीं हैं। फ़िल्म उसकी परवरिश के लिए संघर्ष करती उसकी मां को कहीं भी रेखांकित नहीं करती। पुष्पा इस बात से कुंठित है कि पिता के खानदान में उसकी स्वीकृति नहीं है।

फिल्म बार-बार इस बात पर जोर देती करती है कि पुष्पा के पास कोई फैमिली नेम नहीं है। इससे अच्छी तो सलीम-जावेद की वो पुरानी फिल्में थीं, जिसमें मां का संघर्ष दिखाया जाता था। सत्तर के दशक के अमिताभ का पूरा किरदार पिता से विद्रोह पर टिका था। ‘अग्निपथ’ और ‘दीवार’ के अमिताभ का सारा आंतरिक संघर्ष इस बात पर टिका है कि वह अपनी उस मां से अपने सारे कामों की मान्यता पा जाए, जिनसे वह बड़ा आदमी बना है। वो मां उसे मान्यता दे जो उसकी आदर्श थी। (Reviews Of ‘Pushpa’ Movie)

मगर इस पुष्पा का कोई आदर्श नहीं है। यह तीसरा बड़ा कारण है, जिसकी वजह से इस फिल्म की आलोचना होनी चाहिए। पुष्पा जिस समाज के बीच उठता-बैठता है, उससे उसकी कोई आत्मीयता नहीं है। वह अपने समाज का नेता नहीं है। उसके पास सिर्फ अहंकार है।

“पुष्पा नाम सुनकर फ्लावर समझा क्या?… फॉयर है मैं।” यह डायलॉग इन दिनों बहुत हिट हुआ है, मगर यह कौन सा नायक है? इस नायक का कोई आदर्श नहीं है। ‘पुष्पा – द राइज़’ में उसकी लड़ाई चंदन के तस्करों से इसलिए है क्योंकि वह उनकी दुनिया में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। यह न तो किसी वर्ग संघर्ष की कहानी है, न ही उसके अपने निजी संघर्ष की कहानी है। (Reviews Of ‘Pushpa’ Movie)

पुष्पा सत्तर के दशक के अमिताभ की तरह अपने पिता से नफरत नहीं करता है, फिल्म के क्लाइमेक्स में वह अपने रक्त पर गर्व करता है। यह फिल्म दोबारा पितृसत्ता को मजबूती देती है। इस फिल्म की क्यों तारीफ़ होनी चाहिए यह मेरी समझ से परे है।

(समीक्षाएं दिनेश श्रीनेतसंध्या नवोदिता की फेसबुक वॉल से साभार)

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