वो अखबार, जिसने ब्रिटिशराज के खिलाफ बागियों की फौज तैयार कर दी थी

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By सोहन सिंह ‘जोश’

हिंदुस्तान ग़दर पार्टी का उद्घोषक, “साप्ताहिक ग़दर” एक धर्म-निरपेक्ष, ग़ैर-सांप्रदायिक और क्रांतिकारी जनवादी अख़बार था। यह 1 नवंबर 1913 को उर्दू में छपा था। यह आंदोलनकर्ता, लामबंदक (संगठनकर्ता) और प्रबंधक के मिलते-जुलते कामों को सर-अंजाम देता था। भारतीय प्रवासी इसके तूफ़ानी असर की चपेट में आ गए थे क्योंकि यह, स्पष्ट शब्दों में, उनके दिल के अरमानों की तर्जुमानी करता था।

यह जहाँ भी पहुँचता वहीं ग़दर की शाखाएँ फूटने लगती थी – कुछ अंकों के बाद ही यह घर-घर में लोकप्रिय हो गया था और इसकी माँग इतनी बढ़ गई थी कि कुछ अंकों के बाद ही, इसकी पूर्ति के लिए प्रबंधकों को नए प्रेस का इंतज़ाम करना पड़ा। यह अख़बार इसके हर चाहने वाले को मुफ़्त भेजा जाता था और इसे चलता रखने के लिए पैसों की कोई कमी नहीं थी। पाठक ख़ुद ही इसके चंदे और सहायता राशियाँ भेजते रहते थे। कुछ इस तरह का आकर्षण था साप्ताहिक ग़दर का।

8 दिसबंर 1913 के पंजाबी ग़दर का पहला अंक । पहले पन्ने का खाका : ऊपर की ओर बाएँ कोने में वंदे और दाईं ओर के कोने में मातरम् छपा हुआ है। इन दोनों शब्दों के दरमियान है : “जे तओ प्रेम खेलन का चाओ, सिर धरि तली गली मेरी आओ”। नीचे ग़दर के शीर्ष-लेख का ब्लाक छपा हुआ है। इसके थोड़ा-सा नीचे बारीक अक्षरों में साप्ताहिक छपा हुआ है।

ग़दर की मोटी स्याह रेखा के ऊपर खुदा हुआ है – बर्तानवी सरकार का दुश्मन, उर्दू गुरमुखी अख़बार और बाएँ कोने में नीचे दोनों रेखाओं के दरमियान जिल्द पहली और दाएँ कोने में नंबर–1 और इन शब्दों के दरमियान है : “युगांतर आश्रम, सान फ़्रांसिस्को, अमेरिका, 8 दिसंबर 1913” बाक़ी का सवा दो हिस्से में तक़सीम है – दाएँ आधे हिस्से में “बर्तानवी राज का पर्दाफ़ाश” किया गया है और बाईं ओर के आधे हिस्से में सूची है।

पहले लेख का शीर्षक है : “हमारा काम, हमारा नाम” (पन्ना–2), यह 1 नवंबर 1913 को प्रकाशित हुए उर्दू साप्ताहिक के पहले अंक में छपे लेख की नक़ल है। दूसरा है, “आँकड़ों की गवाही” तीसरा “सिख और सरकार” के बारे में है और चौथा है : “1857 के ग़दर” का इतिहास और फिर एक लेख है : “अमेरिकन क्या कहते हैं?” और फिर है एक कम महत्वपूर्ण लेख, एक कविता और टिप्पणी।

अख़बार के कुछ स्थायी कॉलम थे, जैसे “पर्दाफ़ाश”, “आँकड़ों की गवाही” और ‘‘1857 के ग़दर” का इतिहास पहले दो कॉलमों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के ज़रिए बर्तानवी साम्राज्य द्वारा हिंदुस्तान की होती लूट-खसोट का पर्दाफ़ाश किया जाता था – कच्चे माल और अनाज को सस्ती दरों पर ख़रीद कर और बनी हुई तैयार वस्तुओं को महँगे दाम में बेचकर, इस तरह देश को ग़रीबी में धँसाकर काल, भुखमरी और बीमारियों के मुँह में धकेला जा रहा था।

इनमें राजनीतिक दमन और जनता पर हुए ज़ुल्म, राजनीतिक क़ैदियों से बेरहम बर्ताव, अदालतों के ज़रिए भारतीयों से किए जाते अन्याय और हिंदुस्तान में राजनीतिक आज़ादी की ग़ैर-मौजूदगी की धज्जियाँ उड़ाई जाती थीं। इन पर्दाफ़ाशों का भारतीयों की ज़मीर पर गहरा असर होता था। उनकी विद्रोही भावना प्रचंड हो जाती थी और वे आने वाली क्रांति के लिए तैयार हो जाते थे।

“1857 के ग़दर का इतिहास” के कॉलम की बहुत अधिक राजनीतिक अहमियत थी। इसका मक़सद 1857 के जंगे-आज़ादी के कारनामों को लोगों की आँखों के सामने लाकर हिंदुस्तानियों को लगातार फ़ौज की भूमिका और उसकी एकता की याद दिलाते रहना था, जो बर्तानवी हुक्मरानों को हिंदुस्तान से बाहर निकालने के लिए ग़दर के दौरान हिंदुओं और मुस्लिमों की क़तारों में पैदा की गई थी।

1857 की बग़ावत के दौरान क़ायम हुई ग़ैर-वर्गीय एकता ऐसा शक्तिशाली हथियार थी, जिसने बर्तानवी राज को जड़ों से हिलाकर रख दिया था और यदि कुछ सिख सामंती राजे विशेष रूप में, और ग़ैर-सिख सामंती राजे सामान्य रूप से, संग्राम को पीठ दिखाकर दुश्मन के साथ ना मिल जाते तो बर्तानवी सत्ता का उस वक़्त ही सफाया हो जाना था। यह अख़बार मुस्लिमों को आर्थिक मामलों की ओर अधिक ध्यान देने की माँग करता था, क्योंकि ये सभी लोगों को समान रूप से प्रभावित करते थे।

हिंदु और मुस्लिम दोनों प्लेग की बली चढ़ रहे थे और काल के फैलने से दोनों अनाज के अभाव का शिकार हो गए थे। दोनों को ज़बरन तौर पर बेग़ार (मुफ़्त मशक्कत) के लिए हाँक लिया जाता था और दोनों को ज़मीन का बेतहाशा मालिया और पानी का बहुत सारा आबीयाना अदा करना पड़ता था। मसला हिंदू बनाम मुस्लिम का नहीं, बल्कि भारतीयों बनाम बर्तानवी ग़ुलामकारों का था। हिंदु-मुस्लिम एकता इस क़दर मज़बूत होनी चाहिए थी कि कोई इसे तोड़ने की कोशिश ही ना कर सके।

उस वक़्त नेताओं से वर्गीय ताक़तों के इस क़दर विश्लेषण की उम्मीद नहीं रखी जा सकती थी कि कौन-सी ताक़तें सचमुच ही क्रांतिकारी थीं और कौन-सी नहीं, जिन्होंने क्रांति को धोखा दे जाना था।

यह अख़बार जहाँ कहीं भी जाता प्रवासी भारतीयों के मनों का क्रांतिकारी कायाकल्प कर देता था। यह उनके जीवन को रूपांतरित कर रहा था। यह उनकी एकता को इस क़दर मज़बूत कर देता था कि वे पुराने वैर-विरोध और गिले-शिकवे भूलकर करीबी साथी बनकर एक-दूसरे के लिए जान कुर्बान करने को तैयार हो जाते थे। इसने उनके दरमियान मानवीय आत्म-सम्मान और स्वाभिमान की भावना पैदा कर दी थी और उन्होनें सिर उठाकर चलना शुरू कर दिया था।

पाठक वर्ग का दायरा

ग़दर के पाठक वर्ग का दायरा अमेरिका के एक-दो देशों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि दुनिया के उन सभी देशों तक पसरा हुआ था जहाँ रहते वाले भारतीय मज़दूरी या कोई और काम-काज करते थे। ग़दर बंडल बाँधकर मलाया, हांगकांग, पेनांग, सिंगापुर, शंघाई, सियाम, पनामा, फिलीपीन, अर्जेंटीना, दक्षिण अफ़्रीका और अन्य देशों में भी भेजा जाता था।

इसे लोग अकेले-अकेले और टोलियाँ बनाकर पढ़ते थे और जहाँ कहीं भी यह पहुँचता और पढ़ा जाता था, वहाँ छोटे-छोटे संगठन स्वाभाविक रूप से ही पैदा होकर हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए काम शुरू कर देते थे। इस अख़बार के निकलने से पहले भारत के बाहर अन्य रसाले भी आंदोलन चलाते थे, पर उनके पाठक गुप्त या ज़ाहिर तौर पर बड़े या छोटे स्तर पर काम करते रहे थे।

मैडम कामा का “वंदे मातरम” जेनेवा से निकल रहा था, “तलवार” बर्लिन से और श्याम जी कृष्ण वर्मा फ्रांस से “सोशियोलॉजिस्ट” निकाल रहा था। “फ़्री हिंदुस्तान” पहले वैंकूवर से फिर बदलकर अन्य जगहों से तारक नाथ दास निकाल रहा था। इन रसालों ने भारत के बाहर विद्यार्थियों और अन्य पढ़े-लिखे भारतीयों को लाज़िमी ही प्रभावित किया था।

राजनीतिक जागृति पैदा करने और मातृभूमि के लिए क़ुर्बानियाँ करने में इनकी भूमिका को घटाकर नहीं देखा जा सकता। इन्होंने व्यक्तियों को वीरतापूर्वक कारनामे कर गुज़रने की प्रेरणा दी थी। लेकिन ग़दर, अपनी क्रांतिकारी स्पिरिट और जहाँ कहीं भी यह पहुँचता, विशाल जनांदोलन पैदा करने की दिशा में अन्य सभी अख़बारों से आगे निकल गया था।

इसका प्रमुख मनोरथ भारतीय लोगों और बर्तानवी फ़ौज के सिपाहियों को, जहाँ कहीं भी वे थे, प्रेरित और प्रभावित करके बर्तानवी हुकूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत करना था। यह अख़बार कनाडा और अमेरिका की कई जगहों से पंजाब को बहुत बड़ी संख्या में डाक के ज़रिए भेजा जाता था। लेकिन समुद्र कर क़ानून के तहत इसे भारत में ही नहीं, बल्कि अपनी सभी उपनिवेशों में ज़ब्त कर लेती थी। लेकिन फिर भी इसकी कुछ प्रतियाँ डाक के ज़रिए पंजाब में पहुँच ही जाती थीं और इसमें मौजूद कविताएँ जन-सभाओं में बोली जाती थी।

सरकारी रिपोर्टों के अनुसार ग़दर आंदोलन का उभार अब कई देशों तक पसर गया था। मई 1913 में जी.डी. कुमार समुद्री जहाज़ के ज़रिए सान फ़्रांसिस्को से फ़िलिपीन गया था। उसने मनीला से तारक नाथ दास को लिखे एक ख़त में अपने सफ़र का मनोरथ बताते हुए कहा था, “मैं यहाँ मनीला में, चीन, हांगकांग से शंघाई के नज़दीक काम की निगरानी करने के लिए एक अग्रणी चौकी क़ायम करने जा रहा हूँ। बरकतुल्ला जापान में ठीक-ठाक है।”

हमें सरकारी रिकॉर्डों में यह दर्ज हुआ मिलता है कि लगभग 1915 के मध्य में इस बात की पक्की पुष्टि‍ हो चुकी है कि सान फ़्रांसिस्कों से ग़दर की 3000 प्रतियाँ निश्चय ही डाक के ज़रिए मलाया के राज्यों, डच ईस्ट इंडीज, सियाम और सुदूर पूर्व की कई अन्य जगहों पर रसाल की जा रही हैं, इससे लगता है कि इस वक़्त अख़बार की कुल अशायत काफ़ी ज़्यादा बढ़ चुकी होगी।

अन्य भाषाओं में ‘ग़दर’

ग़दर बाकायदगी से सिर्फ़ उर्दू और पंजाबी में ही छपता था। लेकिन कभी-कभार हिंदी, गुजराती में भी कुछ अंक छापे जाते थे और शायद एक अंक पश्तो में भी प्रकाशित किया गया था। यू.पी. के रघूबर दयाल गुप्ता की उर्दू लिखावट बहुत सुंदर थी, लेकिन हिंदी की लिखावट अच्छी नहीं थी। उसके कहने पर कामचलाऊ ढंग से हिंदी के भी कुछ अंक प्रकाशित किए गए थे।

वो लगभग शुरू से ही युगांतर आश्रम में काम करता था और उसकी इन मामलों में चलती थी। पहला हिंदी संस्करण 1 मार्च 1915 को छापा गया था, लेकिन उसकी हस्तलिखित हिंदी ख़राब थी। ग़दर की गूंज की कुछ कविताएँ और कुछ पुस्तिकाएँ भी हिंदी में छपीं थी। खेम चंद गुजराती पंजाबी की कविताओं पर बहुत मोहित हो गया था।

वो अपना काम छोड़कर यह कहकर युगांतर आश्रम में आ गया था कि उन कविताओं को गुजराती लोग भी समझ सकते थे और ग़दर का एक गुजराती संस्करण भी छापा जाना चाहिए था। उसकी गुज़ारिश मान ली गई और उसने कविताओं का लिप्यांतर और लेखों का गुजराती में अनुवाद किया था और इनका पहला अंक 10 मई 1914 को प्रकाशित हुआ था। इस तरह कुछ गुजराती अंक भी छापे गए थे। मेरा ख़्याल है कि पठानों के तकाज़े पर ग़दर का एक अंक पश्तो में भी निकाला गया था। हरनाम सिंह कोटला का बयान इस बात का साक्षी है।

(हिंदुस्तान ग़दर पार्टी का संक्षिप्त इतिहास पुस्तक का अंश)

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