स्तालिन: मेहनतकशों के पहले राज्य का निर्माता

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– पुण्यतिथि –

मज़दूर वर्ग के पहले राज्य सोवियत संघ की बुनियाद रखी थी महान लेनिन ने, और पूरी पूंजीवादी दुनिया के प्रत्यक्ष और खुफ़ि‍या हमलों, साज़िशों, घेरेबंदी और फ़ासिस्टों के हमले को नाकाम करते हुए पहले समाजवादी राज्य का निर्माण करने वाले थे जोसेफ़ स्तालिन। स्तालिन शब्द का मतलब होता है इस्पात का इंसान – और स्तालिन सचमुच एक फ़ौलादी इंसान थे। मेहनतकशों के पहले राज्य को नेस्तनाबूद कर देने की पूंजीवादी लुटेरों की हर कोशिश को धूल चटाते हुए स्तालिन ने एक फ़ौलादी दीवार की तरह उसकी रक्षा की, उसे विकसित किया और उसे दुनिया के सबसे समृद्ध और ताक़तवर समाजों की कतार में ला खड़ा किया। उन्होंने साबित कर दिखाया कि मेहनतकश जनता अपने बलबूते पर एक नया समाज बना सकती है और विकास के ऐसे कीर्तिमान रच सकती है जिन्हें देखकर पूरी दुनिया दांतों तले उंगली दबा ले। उनके प्रेरक नेतृत्व और कुशल सेनापतित्व में सोवियत जनता ने हिटलर की फ़ासिस्ट फ़ौजों को मटियामेट करके दुनिया को फ़ासीवाद के कहर से बचाया। यही वजह है कि दुनिया भर के पूंजीवादी स्तालिन से जी-जान से नफ़रत करते हैं और उन्हें बदनाम करने और उन पर लांछन लगाने तथा कीचड़ उछालने का कोई मौका नहीं छोड़ते। सर्वहारा वर्ग के इस महान शिक्षक और नेता के निधन के 56 वर्ष बाद भी मानो उन्हें स्तालिन का हौवा सताता रहता है। वे आज भी स्तालिन से डरते हैं। (Stalin: Working-Class State)

रूसी ज़ार के साम्राज्य की एक उत्पीड़ित राष्ट्रीयता जॉर्जिया के गोरी शहर में 21 दिसंबर 1879 को जन्मे जोसेफ़ विसारियोनोविच जुगाशविली ने एक युवा क्रांतिकारी के तौर पर काम करते समय अपना गुप्त नाम स्तालिन रखा था। उनके पिता गांव के एक ग़रीब मोची थे, जो बाद में एक जूता कारख़ाने में मज़दूर बन गए थे। उनकी मां ज़मींदारों के ग़ुलाम भूदासों की बेटी थी। इस तरह स्तालिन ने मज़दूरों और किसानों की ज़िंदगी को क़रीब से जाना था और जॉर्जिया से होने के नाते वे ये भी समझते थे कि ज़ारशाही रूस किस तरह अपने साम्राज्य के ग़ैर-रूसी लोगों को उत्पीड़ित करता था।

पादरी बनने के लिए धार्मिक विद्यालय में पढ़ाई करते समय ही, पंद्रह वर्ष की उम्र में वे भूमिगत मार्क्सवादी क्रांतिकारियों के संपर्क में आए और अठारह वर्ष की उम्र में वे रूसी सामाजिक-जनवादी मज़दूर पार्टी में शामिल हो गए जो आगे चलकर कम्युनिस्ट पार्टी बनी। जल्दी ही स्तालिन ने जॉर्जिया की राजधानी तिफ़लिस और औद्योगिक शहर बातुम में मज़दूरों को संगठित करना शुरू कर दिया। उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और फिर साइबेरिया निर्वासित कर दिया गया।

साल 1904 में वे साइबेरिया के निर्वासन से पुलिस को चकमा देकर निकल आए और फिर से मज़दूरों को संगठित करने में जुट गए। 1905 की असफल रूसी क्रांति के दौरान और उसके कुचले जाने के बाद स्तालिन प्रमुख बोल्शेविक भूमिगत और सैनिक संगठनकर्ताओं में से एक थे। पार्टी से जुड़ने के समय ही स्तालिन ने समझ लिया था कि लेनिन ही क्रांति के मुख्य सैद्धांतिक नेता हैं और पार्टी के भीतर चलने वाले वैचारिक संघर्षों में वे हमेशा पूरी मज़बूती के साथ लेनिन की सही लाइन के पक्ष में खड़े रहे। 1912 में उन्हें केंद्रीय कमेटी में चुना गया। (Stalin: Working-Class State)

फरवरी 1917 में रूस के मज़दूरों और किसानों ने निरंकुश ज़ारशाही के शासन को उखाड़ फेंका। क्रांतिकारी होने का दावा करने वाली रूस की ज़्यादातर पार्टियों ने यह कहना शुरू कर दिया कि रूसी सर्वहारा वर्ग अभी इतना कमज़ोर और पिछड़ा हुआ है कि वह राजनीतिक सत्ता नहीं संभाल सकता।

स्तालिन जब केंद्रीय कमेटी के निर्देश पर सेंट पीटर्सबर्ग में काम संभालने आए तो उन्होंने पाया कि पार्टी के भीतर तीखा आन्तरिक संघर्ष जारी है। उन्होंने लेनिन का पक्ष लिया कि मज़दूर वर्ग को तत्काल समाजवादी क्रांति की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। स्तालिन को बोल्शेविकों के अख़बार ‘प्रावदा’ की ज़िम्मेदारी सौंपी गई और उन्होंने इस विचार को व्यापक अवाम के बीच ले जाने के लिए अख़बार का बख़ूबी इस्तेमाल किया।

अक्टूबर क्रांति के बाद चले लंबे गृहयुद्ध के दौरान स्तालिन एक दृढ़निश्चयी, कुशल और प्रेरक सैन्य नेता के रूप में उभरे।

1919 में स्तालिन को वोल्गा नदी के किनारे महत्वपूर्ण शहर ज़ारित्सिन के मोर्चे पर रसद आपूर्ति बहाल करने की ज़िम्मेदारी देकर भेजा गया। ज़ारित्सिन को क्रान्ति की दुश्मन फ़ौजों ने घेर रखा था और शहर के भीतर भी दुश्मन की ताक़तों ने घुसपैठ कर रखी थी। स्तालिन ने शहर और पूरे क्षेत्र को दुश्मन से आज़ाद करा दिया।

इसके बाद तो स्तालिन को गृहयुद्ध के हर अहम मोर्चे पर भेजा जाने लगा। गृहयुद्ध ख़त्म होने तक स्तालिन एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर स्थापित हो चुके थे जिसे मालूम था कि काम कैसे किया जाता है। अप्रैल 1922 में स्तालिन को कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी का जनरल सेक्रेटरी बनाया गया। (Stalin: Working-Class State)

लेनिन के निधन के बाद रूस में समाजवाद का निर्माण जारी रखने के सवाल पर पार्टी के भीतर एक तीखा संघर्ष छिड़ गया। त्रात्स्की और उनके समर्थकों का कहना था कि सर्वहारा वर्ग अकेले सोवियत संघ में शासन में टिका नहीं रह सकेगा और वे यूरोप के सर्वहारा वर्ग द्वारा उठ खड़े होने पर उम्मीदें लगाए हुए थे।

दूसरी ओर स्तालिन का मानना था कि शोषित-उत्पीड़ित किसानों की भारी आबादी क्रांति में रूसी सर्वहारा का साथ देगी और सोवियत जनता अपने बूते पर न केवल समाजवाद का निर्माण करने में सक्षम है बल्कि देश के भीतर और बाहर के ताक़तवर दुश्मनों से उसकी हिफ़ाज़त भी कर सकती है। पार्टी के भीतर के निराशावादियों और बाहरी प्रतिक्रांकारियों की हरचंद कोशिशों और साज़िशों के बावजूद इतिहास ने साबित किया कि स्तालिन सही थे।

जब बोल्शेविकों ने 1917 में सत्ता संभाली थी तो पूरे रूसी साम्राज्य की हालत ख़स्ता थी। तीन साल तक पूरा सोवियत संघ गृहयुद्ध की लपटों में झुलसता रहा। 1920 में गृहयुद्ध ख़त्म हुआ तो खेती की उपज आधी रह गई थी। उद्योग की हालत तो और भी बुरी थी। बहुत सी खदानें और कारख़ाने तबाह हो गए थे। यातायात और परिवहन की दशा ख़राब थी। आधुनिक उद्योग, खेती, स्वास्थ्य और शिक्षा को विकसित करने के लिए ज़रूरी तकनीकी ज्ञान और कौशल कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित थे जिनमें से ज़्यादातर समाजवाद के ख़िलाफ़ थे। मेहनतकश जनता की भारी आबादी अशिक्षित थी।

सोवियत संघ दुनिया में अलग-थलग पड़ गया था और ताक़तवर पूंजीवादी देशों ने उसकी घेराबंदी कर रखी थी। ज़्यादातर देशों ने उसकी आर्थिक नाकेबंदी की हुई थी, उसे मान्यता देने से भी इन्कार करते थे और पूरी पूंजीवादी दुनिया में “लाल शैतानों” का नामोनिशान मिटा देने के दावे किए जा रहे थे। उस वक़्त दुनिया की हालत ऐसी थी कि पूंजीवादी राष्ट्रों के अलावा ज़्यादातर देश उनके उपनिवेश या नवउपनिवेश थे। लेकिन स्तालिन के नेतृत्व में सोवियत संघ की जनता ने काया ही पलट दी। (Stalin: Working-Class State)

जब 1953 में स्तालिन का निधन हुआ, तो सोवियत संघ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी औद्योगिक, वैज्ञानिक और सैन्य ताक़त बन चुका था और इस बात के स्पष्ट संकेत थे कि इन सभी क्षेत्रों में वह जल्दी ही अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा। यह ज़बर्दस्त तरक़्क़ी भी तब हुई थी, जब दूसरे महायुद्ध के दौरान फ़ासिस्टों को पराजित करने में उसे इतना भीषण नुकसान उठाना पड़ा जो किसी भी अन्य देश को कई दशकों तक पीछे धकेलने के लिए काफ़ी था।

दूसरे विश्वयुद्ध में सोवियत जनता ने अपने दो करोड़ बेहतरीन बेटे-बेटियों को गंवाया था और उसके आर्थिक संसाधनों की भारी तबाही हुई थी। लेकिन चंद ही वर्षों में स्तालिन के नेतृत्व में सोवियत जनता ने चमत्कार कर दिखाया। देश से भुखमरी और अशिक्षा पूरी तरह ख़त्म हो चुके थे। खेती का पूरा सामूहिकीकरण हो चुका था और उसकी पैदावार कई गुना बढ़ चुकी थी। सभी नागरिकों को निशुल्क बेहतरीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध थी। हर स्तर पर शिक्षा मुफ़्त थी।

सोवियत संघ में दुनिया के किसी भी देश से ज़्यादा किताबें छपती थीं और वहां बोली जाने वाली हर भाषा में छपती थीं। बेरोज़गारी, महंगाई, वेश्यावृत्ति, नशाख़ोरी आदि का तो 1930 के दशक तक ही ख़ात्मा हो चुका था। दुनिया में पहली बार महिलाओं को चूल्हे-चौखट की दासता से निजात मिली थी और वे जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी से आगे बढ़ रही थीं।

सोवियत संघ दुनियाभर की संघर्षरत जनता के लिए प्रेरणा और मदद का संबल बना हुआ था। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चीन की जनता साम्राज्यवाद और सामंतवाद के जुवे को उखाड़ फेंक चुकी थी। कोरिया, वियतनाम और पूरे हिन्दचीन में साम्राज्यवादी ताक़तें पीछे हट रही थीं। (Stalin: Working-Class State)

विश्वयुद्ध के दौरान फ़ासिस्टों को खदेड़ रही सोवियत सेना की मदद से स्थानीय कम्युनिस्टों के नेतृत्व में लड़ रही छापामार शक्तियों ने पूर्वी यूरोप के राजतंत्रों और फ़ासिस्ट सैनिक तानाशाहियों को उखाड़ फेंका था और इन सभी देशों में लोक जनवादी सत्ताएं क़ायम हो चुकी थीं। उपनिवेशों और नवउपनिवेशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष आगे डग भर रहे थे और दुनिया की क़रीब एक तिहाई आबादी उपनिवेशवाद के चंगुल से मुक्त हो चुकी थी। अफ्रीका महाद्वीप की जनता जाग उठी थी। पूरी दुनिया की लड़ रही जनता एक स्वर से स्तालिन को अपना दोस्त और नेता मानती थी।

इसीलिए स्तालिन सोवियत संघ में पूँजीवाद की पुनर्स्थापना के मंसूबे रखने वालों की राह की सबसे बड़ी बाधा थे और पूरी दुनिया के पूंजीपति वर्ग की आंखों में लगातार खटकते थे। समाज के भीतर उभरे नए पूंजीवादी तत्वों ने स्तालिन के निधन के बाद 1956 में सोवियत संघ में सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया।

करोड़ों मेहनतकशों की क़ुर्बानी के दम पर बने समाजवादी जनतंत्र को एक पूंजीवादी देश में बदल डाला। अपने इस काम को जायज़ ठहराने के लिए ज़रूरी था कि वे स्तालिन को ग़लत साबित करें और उनके ख़िलाफ़ लोगों के मन में नफ़रत पैदा करें। पूरी दुनिया के पूंजीपतियों ने ख़ुशी-ख़ुशी इस काम में उनका साथ दिया और आज तक उनका यह झूठा अभियान जारी है।

साभार: मजदूर बिगुल पत्र में प्रकाशित लेख के संपादित प्रमुख अंश


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