‘राम’ संग किया इतिहास में नाम, कुरान पर हैं आंसुओं के निशान

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खाते-पीते पठान परिवार में पैदा हुआ नौजवान। फौजी जैसा जिस्म। लहजे में नरमी और जज्बा लोहे जैसा। भारत के क्रांतिकारी इतिहास में इस शहादत का अनूठापन भी है। जिसका जिगरी दोस्त राम था और साथ में कुरान भी था। मुल्क की तकदीर बदलने की हसरत आखिरी सांस तक बनी रही। पुनर्जन्म में यकीन तो नहीं था, लेकिन यह हसरत भी रही कि काश एक बार और पैदा हो जाऊं और अपने मुल्क को आजाद होते हूं। शायद यही सोचकर उनके कुछ आंसू उनकी कुरान पर टपके, जिसके निशान आज भी मौजूद हैं। इस महान क्रांतिकारी के आखिरी शब्दों में था- कुछ आरज़ू नहीं, इक आरज़ू यही है, कोई लाके रख दे, ख़ाक-ए-वतन कफ़न में…. (Shaheed Ashfaq Ullah Khan)

वह मनहूस तारीख 19 दिसंबर थी, जब 1927 काे सरकार के खिलाफ जंग छेड़ने का आरोपी बनाकर अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी फांसी देकर अशफाक उल्ला खां की हत्या कर दी। उनके साथी रामप्रसाद बिस्मिल और रोशन सिंह को भी फांसी दी गई, जबकि राजेंद्र लाहिड़ी को दो दिन पहले 17 दिसंबर को फांसी दी गई। इन क्रांतिकारियाें को फांसी देने का फैसला काकोरी केस पर सुनवाई के बाद अंग्रजों की अदालत ने दिया था।

अशफाक उल्ला खां 22 अक्टूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे। शफीकुर रहमान और मजहरुन्निशा के छह बच्चों में से सबसे छोटे थे। पिता पुलिस विभाग में कार्यरत थे। जिस समय महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया था, तब अशफाक उल्ला खां स्कूली छात्र थे। लेकिन इस आंदोलन ने पूरे देश में सभी को उद्वेलित कर दिया, क्रांतिकारी दल के ज्यादातर सदस्याें के इतिहास में यह चैप्टर जरूर मिलता है। अशफाक पर भी इसका असर हुआ और उन्होंने भी यही से क्रांति की यात्रा शुरू की। (Shaheed Ashfaq Ullah Khan)

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चौरी-चौरा की घटना के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को स्थगित कर भारत के युवाओं को निराशाजनक स्थिति में छोड़ दिया। अशफाक उल्ला भी उनमें से एक थे। उन्होंने जल्द से जल्द भारत को आजाद कराने ठान ली और क्रांतिकारी दल हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संघ से जुड़ गए।

इस दल के नेता शाहजहांपुर के ही राम प्रसाद बिस्मिल के साथ गहरी दोस्ती हो गई। बिस्मिल की आर्यसमाजी और अशफाक की इस्लामिक आस्थाओं के बावजूद, दोनों का भारत को ब्रिटिश शासन के बंधनों से मुक्त कराना साझा मकसद बन गया। आस्थाओं को व्यवहार में तोड़ा, जिसने उन्हें क्रांतिकारी बना दिया। उनके लिए देश और साथी सबसे बहुमूल्य थे। आस्था निजी हवाले कर दीं और उनको कभी आड़े नहीं आने दिया।

8 अगस्त 1925 को शाहजहांपुर में क्रांतिकारियों की बैठक हुई, क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखने के लिए धन की जरूरत को सरकारी खजाने को जब्त करने फैसला लिया। इस कार्रवाई पर अशफाक की असहमति थी, इसलिए कि इससे आम लोगों में क्रांतिकारियों के प्रति गलत संदेश जाएगा। हालांकि और कोई चारा भी नहीं था, इसलिए असहमति के बावजूद उन्होंने कार्रवाई को सफल बनाने में भूमिका निभाई। (Shaheed Ashfaq Ullah Khan)

9 अगस्त 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला, राजेंद्र लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, शचींद्र बख्शी, चंद्रशेखर आजाद, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुकुंदी लाल, मन्मथनाथ गुप्त समेत कई क्रांतिकारियों के इस समूह ने लखनऊ से पहल काकोरी गांव के पास सरकारी धन ले जाने वाली ट्रेन को चेन खींचकर रोक दिया और अंग्रेजों द्वारा भारतीय से लूटे खजाने को बलपूर्वक अपने नियंत्रण में ले लिया।

अंग्रेजी लुटेरों के गार्डों ने गोली चलाकर हमला किया तो जवाब में उन्होंने भी फायर झोंक दिया, जिसमें एक की मौत हो गई। अंग्रेजों ने हल्ला मचा दिया कि डकैतों ने ट्रेन लूट ली। साम्राज्यवादी लुटेरों की पुलिस ने क्रांतिकारियों की तलाश में पूरा जोर लगा दिया।

आखिरकार, राम प्रसाद बिस्मिल को 26 सितंबर 1925 की सुबह अंग्रेजों की अपराधी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। अशफाक उल्ला तक उनके हाथ अभी भी नहीं पहुंच पाए। वह बिहार से बनारस के लिए चले गए और वहां जाकर उन्होंने इंजीनियरिंग कंपनी में काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने 10 महीने तक वहां काम किया। वह इंजीनियरिंग का अध्ययन करने के लिए विदेश जाना चाहते थे, जिससे आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम में ज्यादा मदद कर सकें। इस मकसद को पूरा करने के लिए दिल्ली भी गए।

इस बीच अशफाक उल्ला खां से एक चूक हो गई। उन्होंने अपने पठान मित्रों में से एक पर भरोसा करके मदद मांगी। उसने मदद करने का नाटक किया और अशफाक को अंग्रेज पुलिस के हवाले कर दिया।

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अशफाक उल्ला खां को फैजाबाद जेल में बंद कर दिया गया। उनके भाई रियासतुल्लाह उनके वकील थे, जिन्होंने केस लड़ा। काकोरी एक्शन केस राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को मौत की सजा, जबकि अन्य लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाकर खत्म किया गया। (Shaheed Ashfaq Ullah Khan)

अक्सर काकोरी की इस ऐतिहासिक घटना को ट्रेन डकैती कहा गया, जिसका केस काकोरी षड्यंत्र केस नाम से चलाया गया। आजादी के बाद भी यही शब्द प्रचलित हुए। आज भी सैकड़ों वेबसाइट या किताबों के लेखों में यही शब्द दोहराए जाते हैं। क्रांतिकारियों के सम्मान में कुछ लेखकों ने काकोरी की घटना को काकोरी एक्शन कहना शुरू किया है। खजाने की लूट कहा जाना भी जारी रहा।

सच तो यह है कि अंग्रेजों का लूटा हुआ खजाना क्रांतिकारियों ने देश आजाद कराने के लिए बलपूर्वक साहसी तरीके से जब्त किया था। लुटेरों का माल बरामद करके कब्जे में लिया था। आजाद भारत में आज यही कहा जाना चाहिए। साम्राज्यवादी लूट का माल जनहित में जब्त किया जाना क्रांतिकारी कार्रवाई तब भी था, आज भी है।


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