किसानों की नई मुसीबत, बादलों की बेरुखी, चले गए कजाकिस्तान

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मनमीत


कृषि कानूनों का नफा-नुकसान अपनी जगह, किसानों के सामने एक नई चुनौती खड़ी होने वाली है। जिन बादलों से फसल लहलहाना है और फलों की मिठास तय होना है, वे रास्ता बदल गए। इस बदलाव से सिर्फ किसान ही नहीं, कई कारोबार और आम जनजीवन भी प्रभावित होने की संभावना है।

हालात क्या हैं? उत्तराखंड के पर्यटक स्थल औली में इस साल प्रस्तावित सीनियर स्कीइंग नेशनल चैंपियनशिप का आयोजन होना है, लेकिन इस साल औली में बर्फ नहीं है, जिससे खेलों की तिथि का एलान नहीं हो पा रहा है।

आयोजक मायूस हैं और बर्फबारी का इंतजार कर रहे हैं। उनकी दिलासा है कि बर्फबारी होने के तुरंत बाद ही खेल की तिथि निर्धारित कर दी जाएगी। लेकिन, बर्फबारी कब होगी? ये किसी को नहीं पता।

उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ों में इस बार पिछले कई सालों की तुलना में बेहद कम हिमपात हुआ है। शिमला, नैनीताल और मसूरी जैसे पर्यटक स्थलों पर तो हिमपात हुआ ही नहीं है।

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वैज्ञानिकों ने जताई गंभीर चिंता

पोस्ट मानसून (अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर में होने वाली बारिश) के फैल होने के बाद अब प्री मानसून (जनवरी, फरवरी और मार्च में होने वाली बारिश) के भी सूखा होने की संभावना दिख रही है। लेकिन, जहां एक ओर हिमालय के दो राज्य उत्तराखंड और हिमाचल में सूखे जैसे हालत हो गए हैं, वहीं पड़ोसी राज्य कश्मीर में हिमपात रिकाॅर्ड तोड़ रहा है।

मौसम विज्ञानिकों ने इसके पीछे कारण बताया है कि यूरोप से आने वाले बादल (पश्चिमी विक्षोभ) इस बार कश्मीर के ऊपर रास्ता भटक कर सेंट्रल एशिया की तरफ बढ़ रहे हैं। लिहाजा, जो बारिश मध्य और उत्तरी भारत में होनी चाहिए थी, वो कश्मीर और सेंट्रल एशिया के देशों की तरफ बढ़ जा रही है।

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क्या है मुख्य कारण

भारत में होने वाली बारिश के तीन मुख्य कारण होते हैं। पहला पूर्वी विक्षोभ (ईस्टर्न डिस्टर्बेंस), जो बंगाल की खाड़ी से होते हुये मध्य भारत तक पहुंचता है। दूसरा पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस), जो यूरोप के नीचे भू-मध्य सागर से उठता है और बादल बनकर पाकिस्तान के रास्ते कश्मीर में प्रवेश कर हिमालय से टकराता है। इससे मध्य हिमालय समेत उत्तरी और पश्चिमी भारत में बारिश होती है।

भारत में मानसून की होने वाली बारिश के अलावा पोस्ट मानसून और प्री मानसून की बारिश पश्चिमी विक्षोभ के कारण ही होती है। लेकिन इस बार अक्टूबर से दिसंबर पोस्ट मानसून में उत्तराखंड में जहां मानसून -150 फीसद रहा, वहीं हिमाचल में भी इस बार इन तीन महीनों में बारिश औसत से सौ फीसद कम हुई।

पिछले साल हिमाचल में 33 फीसद ज्यादा बारिश हुई थी। पहले वैज्ञानिकों ने संभावना जताई थी कि जनवरी से मौसम का हाल ठीक हो सकता है। लेकिन अब मौसम वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि अप्रैल तक मौसमी चक्र में भारी बदलाव दिख रहा है। जिसके परिणाम भी काश्तकारों के साथ देश की अर्थव्यवस्था को भुगतने पड़ सकते हैं।

उत्तराखंड मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक बिक्रम सिंह बताते हैं कि हर तीसरे या चौथे दिन भू मध्य सागर से एक विक्षोभ उठता है, जो बादल बनकर मध्य पूर्व के देशों से होते हुए पाकिस्तान के ऊपर गुजरते हुए भारत पहुंचता है।

भारत तक पहुंचने के लिये इन विक्षोभ को काफी नीचे रहना होता था, लेकिन इस बार ये विक्षोभ इतने हायर एल्टीटयूड में हैं कि सीधे सेंट्रल एशिया की तरफ मुड़ जा रहे हैं। इसीलिए कश्मीर में तो औसत से ज्यादा बारिश और रिकाॅर्ड हिमपात हो रहा है, लेकिन उत्तराखंड और हिमाचल में औसत से बेहद कम है।

शोध में ये भी सामने आया है कि ये हालात अप्रैल तक लग रहे हैं। इसका मतलब, इस बार ग्लेशियर में जहां कम ‘स्नो’ गिरेगी और उसके नीचे की ‘आइस’ ज्यादा पिघलेगी। जिसके दूरगामी गंभीर परिणाम सामने आएंगे। वहीं गर्मियों में हिमालय का औसत तापमान ज्यादा रह सकता है। जिससे तेजी से ग्लेशियर पिघलेंगे।

आईएमडी के डाटा के अनुसार, पिछले साल पोस्ट मानसून (अक्टूबर-दिसंबर) के दौरान, भारत में सामान्य (123.8 मिमी) से 29 फीसद ज्यादा 160 मिमी बारिश हुई। जबकि इस बार -100 फीसद बारिश हुई है।

सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, हिमाचल, तेलंगाना, उडीसा, झारखंड, बिहार, उत्तरप्रदेश, आंध्राप्रदेश, सिक्कम, पंजाब, दिल्ली और गोवा हैं। जबकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में हालात ज्यादा खराब नहीं रहेंगे।

वहीं, जम्मू कश्मीर और नाॅर्थ ईस्ट (सिक्किम को छोड़कर ) के सभी राज्यों में ठीकठाक बारिश होगी। बारिश कम होने से हवा में नमी का स्तर बिल्कुल गायब रहेगा। जिससे हवा बिल्कुल रूखी बहेगी। इन रूखी हवाओं के चलते रात को तापमान सामान्य से नीचे गिरेगा। जबकि दिन में धूप होने पर तापमान सामान्य से दो या तीन डिग्री ज्यादा रहने का अनुमान है।

ये हो सकते हैं नुकसान

अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर की पोस्ट मानसून बारिश से मैदानों में जहां रबी की फसलों का उत्पादन तय होता है, वहीं हिमालयी राज्यों में सेब का उत्पादन और उसकी मिठास बढ़ती है। वहीं जनवरी, फरवरी और मार्च की बारिश से खरीफ की फसल प्रभावित होती है।

पिछले साल हिमाचल और उत्तराखंड में पोस्ट मानसून और प्री मानसून में 29 फीसद अधिक बारिश हुई थी। जबकि मध्य भारत के राज्यों में लगभग 25 फीसद बारिश हुई। इस कारण फसलों के उत्पादन में वद्धि भी हुई। इस बार इन तीन महीनों में पश्चिमी विक्षोभ की गतिविधि बेहद कम दिख रही है।

उत्तराखंड के मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक और वरिष्ठ वैज्ञानिक विक्रम सिंह बताते हैं, ” मार्च तक सामान्य से बहुत कम बारिश मिलने की संभावना है। हिमालय के उंचाई वाले इलाकों में नवंबर, दिसंबर और जनवरी में होने वाले हिमपात भी पश्चिमी विक्षोभ के कमजोर रहने के कारण कम हुआ है। जिसे सेब की फसलों को कम चिलिंग मिली है।”

मौसम चक्र आगे खिसकना हो सकता है कारण

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के ग्लेशियर वैज्ञानिकों ने कुछ साल पूर्व ये शोध किया था कि मौसमी चक्र तेज गति से आगे बढ़ रहा है। इसके व्यापक परिणाम आगे सामने आएंगे।

संस्थान में तीस साल तक ग्लेशियरों में शोध करने वाले और अपने शोधों के कारण टाइम मैगजीन में छप चुके वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. डीपी डोभाल बताते हैं कि मौसम चक्र में भारी बदलाव ग्लोबल वार्मिंग के कारण ही हो रहा है। हर मौसम अपने रिकॉर्ड स्तर को छू रहा है।

” ग्लोबल वार्मिंग के कारण पहले हिमालय के विभिन्न क्षेत्र में हिमपात नवंबर, दिसंबर और जनवरी में अमूमन ज्यादा होता था। अब जनवरी, फरवरी, मार्च के बाद अप्रैल तक इसका दायरा बढ़ गया है। कई वर्षों बाद पिछली सर्दियों में जमकर बर्फबारी हुई थी और उसके बाद अब गर्मी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है। गर्मी के मौसम का दायरा आगे बढ़ रहा है और मौसम का समय भी उसी अनुपात में खिसक रहा है”, डॉ. डोभाल ने कहा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों से जुड़े रहे हैं)

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