किसान आंदोलन: कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं भूमिहीन दलित और खेत मजदूर

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  • कृष्ण कुमार निर्माण, करनाल

मोदी सरकार के लिए चुनौती बने किसान आंदोलन में भूमिहीन किसान भी हैं, जो मजदूरी के साथ खेती से होने वाली थोड़ी बहुत कमाई करते हैं और हाशिए के वे किसान भी हैं जो अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि रखते हैं।

गुरमेल सिंह पंजाब के मोगा जिले के निहाल सिंह वाला तहसील में राके कलां गांव केे एक भूमिहीन कृषक व खेतिहर मज़दूर हैं। वे दलित समाज से आने वाले मज़हबी सिख हैं, जो अपना जीवनयापन थोड़ी ज़मीन किराए पर लेकर करते हैं। उनका मानना है कि कारपोरेट के बड़े-बडे़ खेतों के बाद ये संभव नहीं होगा।

वह कहते हैं, मैं अपनी बेटी को पढा़ पाया, जो आज चंडीगढ़ में एक बैंक में काम करती है। मैं थोड़ी बहुत सब्ज़ी और छोटे पौधे उगाकर बाज़ार में बेचने के लिए 20 हजार रुपये सालाना किराए जमीन लेता हूं। साल केे कुछ महीने हम 300-400 रुपए दिहाड़ी पर दूसरों की फसल काटने में मदद करते हैं।

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कारपोरेट कंपनियां खेतों को ले लेंगे तो हमें काम नहीं मिल पाएगा। गुरमेल की तरह ही लाभ सिंह भी एक भूमिहीन मज़हबी किसान हैं, जो दलित समाज से आते हैं। वह अमृतसर जिले के अजनाला कस्बे के गांव से हैं और वहां की देहाती मज़दूर सभा के प्रधान हैं। उनका कहना है कि उनके गांव के छोेटे किसान और खेतिहर मज़दूर दिल्ली की सीमा पर किसान आंदोलन में भाग लेने आए हैं।

वह कहते हैं, पहले तो मोदी साकार ने महामारी के दौरान लॉकडाउन और तरह तरह की पाबंदियों के बीच ये कानून लाकर गलती की। दूसरा जब इन कानूनोें की वजह से बड़े उद्योगपति कृषि में आ जाएंगे छोटे किसान और मज़दूरोें को खेती के लिए ज़रूरी चीज़ें गुंजायश के बाहर हो जाएंगी।

हरदेव सिंह भट्टी अमृतसर के बाबा बुटाला के गांव में एक भूूमिहीन खेतिहर मजदूर और राजमिस्त्री होने के साथ-साथ कवि भी हैैं। वह भट्टे पर एक हजार ईंट बनाने पर 650 रुपये कमाते हैं, जिसमें उन्हें आमतौर पर 2 से 3 दिन लगते हैं।

भट्टी कहते हैं, ‘पहले प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की, फिर महामारी के बीच ये कानून लाए हैं जो थोड़ी बहुत मजदूरी पर जीने वालों को गुलाम बना देंगे’।

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गुरमुख सिंह दलितों के हक के लिए बनी जमीन प्राप्ति संघर्ष कमेटी के जोनल सदस्य हैं। वह दिल्ली के टिकरी बॉर्डर प्रदर्शनकारियों के साथ हैं। उन्होंने आशंका जताई कि नए कानून सबसे पहले धान और गेेहूं जैसे आवश्यक खाद्यान्न को पहुंच से बाहर करेंगे।

उसके बाद यह सरकारी राशन की दुकानों पर मिलने वाले सस्तेे अनाज को धीरे धीरे खत्म कर देंगे। उन्होंने कहा, इस सबसे परे मंडी तंत्र के कमजोर होने का सीधा असर पल्लेदार कामगारों की आजीविका पर पड़ेगा, जो धान और गेहूं के बोरे मंडियों से ढोकर रेलगाड़ी तक ले जाते हैं।

(ये लेख किसान आंदोलन स्थल से प्रकाशित अखबार ‘ट्रॉली टाइम्स’ में भी प्रकाशित हुआ है)

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