आज के दिन जन्मे मुगल बादशाह हुमायूं, जिनकी बेगम ने तराशी मुगलिया वास्तुकला

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6 मार्च 1508 को दूसरे मुगल बादशाह नसीरुद्दीन हुमायूं पैदा हुए। पिता बाबर की मौत के बाद 29 दिसंबर 1530 को उन्होंने सल्तनत की गद्दी संभाली। हुमायूं का निधन 22 फरवरी 1556 को हुआ। हालांकि, कई जगह निधन की तारीख दूसरी भी बताई जाती हैं। इस बात से ज्यादा अहम यह इतिहास है कि हुमायूं की मौत के बाद ही मुगल सल्तनत की वास्तुकला पनपना शुरू हुई, इसकी शुरुआत हुमायूं के मकबरे से हुई और ताजमहल भी उसी का विकसित रूप है। (Mughal Fort Tomb Heritage)

मुगलकाल में बनी इमारतों के बारे में अक्सर कई निरर्थक दावे होते रहते हैं। ऐसे दावे करने वाले अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि मुगल वास्तुशिल्प के मामले में इतने होशियार थे तो जहां से आए, वहां क्यों कोई इमारत नहीं बना पाए। इस सवाल में कोई इतिहास का नजरिया नहीं होता, बल्कि मनमानी कहानी होती है। काफी लोग इस तरह की दलील से भ्रमित भी हो जाते हैं, इसलिए इस मामले को जान लेने में कोई बुराई नहीं है।

यह मामला मुगलिया सल्तनत की बुनियाद रखने वाले बाबर के बेटे हुमायूं से जुड़ा है।

6 मार्च 1508 को दूसरे मुगल बादशाह नसीरुद्दीन हुमायूं पैदा हुए। पिता बाबर की मौत के बाद 29 दिसंबर 1530 को उन्होंने सल्तनत की गद्दी संभाली।

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हुमायूं का शासन अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत के हिस्सों पर 1530 से 1540 तक रहा। इसी बीच शेरशाह सूरी से जंग में हार जाने से उसे काबुल, सिंध अमरकोट में पनाह लेना पड़ी और फिर ईरान के शासक सफविद शाह की मदद लेने पहुंचे।

शाह की मदद से उसने काबुल, कंधार समेत मध्य एशिया के कई क्षेत्रों को जीतकर फिर ताकत बढ़ा ली। इसके बाद दरबदर करने वाले शेरशाह सूरी से फिर सामना हुआ। इस बार उसे कामयाबी मिली और 1555 में वह जीत कर फिर दिल्ली और आगरा का बादशाह बन गया। (Mughal Fort Tomb Heritage)

Hameeda Beghum

बदकिस्मती यह रही कि एक साल ही बीता कि 1556 में सीढ़ियों से गिरकर उसकी मौत हो गई। ऐसा भी कहा जाता है कि वह नशे में होने से लड़खड़ाकर गिर गया था। उसके बाद उसके 13 साल के बेटे अकबर की ताजपोशी हुई।

हुमायूं की हार की वजह से ही मुगलिया सल्तनत के मशहूर वास्तुशिल्प की बुनियाद पड़ी। कैसे हुआ ये। इसका पहला जवाब यह है कि ईरान से गहरा नाता होने के चलते मुगल दरबार की रंगत भी उसी रंग में ढलती चली गई।

उससे भी आगे का मुगल वास्तुशिल्प के विकास का इतिहास और ज्यादा दिलचस्प है।

taimur’s tomb

मुगल इमारतों का वास्तुशिल्प मूलरूप से फारसी है। फारस के कुछ तैमूर वंशीय शासकों के मकबरों से ये मेल खाते हैं, जिन्होंने मध्य एशिया और फारस में लंबे समय तक राज किया और भारतीय उप महाद्वीप के भी कई हिस्सों पर दखल रहा। (Mughal Fort Tomb Heritage)

तैमूरी वास्तुकला के आधार पर समरकंद में तैमूर की कब्र है। बाबर को तैमूर विरासत पर नाज था और समरकंद को न हासिल कर पाने का उसे बहुत पछतावा रहा। उसके उत्तराधिकारी भी समरकंद को हासिल करने का ख्वाब देखते रहे।

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isa khan ka makbara

शेरशाह सूरी के खास रहे ईसा खान का मकबरा भी फारसी वास्तुशिल्प का शुरुआती नमूना है, जिसे हुमायूं के मकबरे की परिधि के बाहर 1547 में बनाया गया था। ईसा खान के मकबरे के लिए प्रत्यक्ष मॉडल शायद सिकंदर लोदी का मकबरा बना होगा।

ईसा खान के मकबरे को भी सुंदर अनुपात में बनाया गया है। इसमें गुंबद के चारों ओर छतरियों और मीनारों को बनाया गया, लेकिन सिकंदर लोदी के मकबरे में यह अतिरिक्त ढांचे नदारद थे।

sikardar lodi ka makbara

हुमायूं की बीवी हमीदा बेगम फारसी थीं। दिल्ली में अपने शौहर की कब्र पर मकबरे को उन्होंने दस साल 1562-1572 के बीच अपनी देखरेख में बनवाया। मकबरे का वास्तुकार मिरक मिर्ज़ा भी फ़ारसी था और उसने पहले हेरात (उत्तर-पश्चिमी अफ़गानिस्तान), बुखारा (उज्बेकिस्तान) और भारत में भी कुछ जगहों पर इमारतें बनाई थीं। (Mughal Fort Tomb Heritage)

इमारत निर्माण के लिए यमुना नदी के तट के नजदीक जगह को चुना गया, जिसके पास ही मशहूर सूफी संत निजामुद्दीन औलिया की खानकाह है। चिश्तिया परंपरा का मुगलों ने बहुत सम्मान किया है। इसकी छाप कई इमारतों में साफ दिखाई भी देती है। हुमायूं के बेटे अकबर ने फतेहपुर सीकरी में नए महल का निर्माण चिश्तिया संत की खानकाह के बगल में कराया।

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humaun ka makbara

दरअसल, हमीदा बेगम की देखरेख में बने हुमायूं के मकबरे ने मुगल मकबरों और इमारतों के लिए कुछ अहम मानदंडों को स्थापित कर दिया। निर्माण से पहले ज्यामितीय अध्ययन करके जगह को हर लिहाज से परखा गया और पूरी रूपरेखा तैयार की गई, जिससे तैयार इमारत में न सिर्फ वैभव दिखे, बल्कि जन्नत की कल्पना का आभास हो। व्यवस्थित बगीचा, कई जल चैनलों का जाल इस तरह का अहसास कराते हैं, जहां पहुंचकर लोगों को सुकून महसूस होता है।

हुमायूं का मकबरा फारसी वास्तुशिल्प में दो गुंबद वाली पहली भारतीय इमारत है। यह अपनी बनावट में इस्तेमाल किए गए अनुपात की बारीकियों के लिए जानी जाती है। बाद में मुग़ल मकबरों में इस मॉडल को अपनाया गया, ताजमहल भी इसमें शुमार है। (Mughal Fort Tomb Heritage)

fatehpur seekri qila

फारसी वास्तुकला में भारतीय वास्तुकला के तत्व भी शामिल किए गए, छत पर छत्र इसकी पहचान हैं। नक्काशीदार पत्थरों से सजावट में भी दोनों वास्तुकलाओं का मेल कराया गया।

फारसी शैली में बाग-बगीचे तैयार कराने की छोटी शुरुआत पहले बाबर ने की थी। बाद में दिल्ली में लाल किले और आगरा में ताजमहल में भी इस शैली को शामिल किया गया।


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