Covid-19 महामारी: हाशिए पर दलित और आदिवासी

  डॉ. सोमनाथ आर्य-

देश में स्वास्थ्य सेवा पाने के लिहाज से सामान्य वर्ग के लोग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति परिवारों की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कोविड काल में देश में दलितों और आदिवासियों के स्वास्थ्य की स्थिति में काफ़ी गिरावट आई है। उन्हें वह बुनियादी सुविधायें नहीं मिल सकीं जिसके वे हकदार थे। इसी पैमाने के लिहाज से हिंदू मुसलमानों से बेहतर हैं, गरीबों की तुलना में अमीर स्वास्थ्य के लिहाज से अच्छी स्थिति में हैं। महिलाओं के मुकाबले पुरुष और ग्रामीण क्षेत्र की आबादी की तुलना में शहरी आबादी की स्थिति बेहतर है।

ऑक्सफैम इंडिया की स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में असमानता से जुड़ी 2021 की रिपोर्ट में ये बातें सामने आईं हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा के अभाव में हाशिए पर जीने वाले लोग बड़े पैमाने पर प्रभावित हुए हैं, खासतौर पर तब जब कोविड-19 महामारी के कारण देश में सामाजिक-आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य वर्ग से जुड़े 65.7 प्रतिशत परिवारों के पास शौचालय आदि की सुविधाएं बेहतर हुई हैं जिसे उन्हें किसी के साथ साझा नहीं करना पड़ता है जबकि केवल 25.9 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति परिवारों के पास ऐसी सुविधा है।

इसके अलावा, सामान्य श्रेणी के घरों की तुलना में अनुसूचित जाति के घरों में 12.6 प्रतिशत से अधिक बच्चों की शारीरिक वृद्धि नहीं हुई है। शीर्ष स्तर पर मौजूद 20 फीसदी आबादी की तुलना में निचले स्तर पर मौजूद 20 फीसदी लोगों के घरों में पांच वर्ष की उम्र से पहले मरने वाले बच्चों की तादाद तीन गुना अधिक है।

ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) के तहत अस्पतालों में जन्म और पूरक खाद्य सामग्री की उपलब्धता हिंदू परिवारों की तुलना में मुस्लिम परिवारों में 10 प्रतिशत कम है और मुस्लिम परिवारों में 8 फीसदी कम ही बच्चों का टीकाकरण किया जाता है।

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कोविड-19 महामारी की दूसरी भयावह लहर ने भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा तंत्र की खामियों को और भी उजागर किया है। 2017 में नैशनल हेल्थ प्रोफाइल (एनएचपी) के मुताबिक प्रत्येक 10,189 लोगों पर केवल एक सरकारी एलोपैथिक डॉक्टर है और प्रत्येक 90,343 की आबादी पर एक सरकारी अस्पताल है। भारत में प्रत्येक एक हजार की आबादी पर अस्पताल में बेड की संख्या 0.5 है जो बांग्लादेश (0.87), केन्या (1.4) और चिली (2.1) जैसे अविकसित देशों की तुलना में काफी कम है।

ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले दशक में सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली का बुनियादी ढांचा कम फंडिंग के कारण और खराब हुआ है। साल 2010 और 2020 के बीच प्रत्येक 10,000 की आबादी पर अस्पताल बेड की संख्या 9 से घटकर 5 हो गई है। अस्पतालों में बेड उपलब्धता के लिहाज से 167 देशों में भारत 155वें स्थान पर है और 10,000 की आबादी पर पांच बेड और 8.6 डॉक्टर उपलब्ध हैं।

रिपोर्ट से पता चलता है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में जहां 70 फीसदी आबादी रहती है उनके पास मुश्किल से 40 फीसदी ही बेड हैं। इसका नतीजा यह भी हुआ कि कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान संक्रमण के प्रत्येक दो मामलों में से एक मामला ग्रामीण क्षेत्र से था और मई महीने में उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान जैसे राज्यों में संक्रमण के 75 फीसदी मामले ग्रामीण क्षेत्रों से ही थे।

ऑक्सफैम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर ने कहा, ‘भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, विशेष रूप से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा तंत्र और अपर्याप्त स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के लिए सरकार की फंडिंग जरूरी हो गई है।

पिछले कुछ दशकों में भारत के समग्र स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार हुआ है हालांकि इस सुधार का लाभ कुछ वर्ग को नहीं मिला है। मिसाल के तौर पर बेहतर स्वास्थ्य प्रणाली ने जीवन प्रत्याशा बढ़ाने में मदद की है लेकिन लिंग, जाति और आय के स्तर के लिहाज से इसके नतीजे अलग-अलग दिखते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक अमीर लोग गरीबों के मुताबिक औसतन साढ़े सात साल ज्यादा जीते हैं वहीं सामान्य वर्ग की महिला किसी दलित वर्ग की महिला की तुलना में औसतन 15 साल अधिक जीती है। शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) में समग्र स्तर पर सुधार दिखता है वहीं सामान्य वर्ग की तुलना में दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़ा वर्ग में शिशु मृत्यु दर अधिक है।

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सरकार के ही अनुमानों के मुताबिक स्वास्थ्य से जुड़े खर्च के कारण हर साल 6 करोड़ लोग और गरीब हो जाते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत स्वास्थ्य खर्च के लिहाज से 154वें स्थान पर है और यह स्थान नीचे से पांचवें पायदान पर है।

साल 2021-22 के केंद्रीय बजट के मुताबिक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 76,901 करोड़ रुपये का कुल आवंटन किया गया और यह 2020-21 के 85,250 करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान की तुलना में 9.8 फीसदी कम है।

रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य पर अधिक खर्च करने वाले राज्यों में कोविड-19 के कम मामले थे। वहीं स्वास्थ्य पर अधिक खर्च करने वाले राज्यों ओडिशा और गोवा में भी कोविड-19 की रिकवरी दर अधिक थी। रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा दी जाने वाली बीमा योजनाओं का दायरा सीमित था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सूचना के अधिकार (आरटीआई) के माध्यम से मिले आंकड़ों से पता चला है कि केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना के तहत कोविड-19 बीमारी के लिए केवल 19 लोगों का ही इलाज हो सका जो दूसरी लहर के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में से एक है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व लेखक हैं, यह उनके निजी विचार हैं)


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